बॉलीवुड के बजाय साउथ से उभर रहे हैं पुरुष-नायक

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‘तेरे को क्या चाहिए रे?’ गैंग का बॉस पूछता है। ‘पूरी दुनिया’, जूते पॉलिश करने वाला छोटा लड़का जवाब देता है। 2018 में आई कन्नड़ ब्लॉकबस्टर ‘केजीएफ’ के हाल ही में रिलीज हुए सीक्वेल में बच्चे की यह ख्वाहिश अब पूरी कर दी गई है।

अमिताभ बच्चन की क्लासिक फिल्मों ‘दीवार’ (1975) व ‘काला पत्थर (1979) से प्रेरित ‘केजीएफ’ में रॉकी का चरित्र रचा गया है, जिसकी मां की मृत्यु हो जाती है। इसके बाद उसके जीवन में कुछ शेष नहीं रह जाता, सिवाय इसके कि वह अपने साथ खड़े लोगों की मदद से अमीर, ताकतवर और न्यू-एज सुल्तान बनकर दिखलाए।

आज जहां रनबीर कपूर और रणवीर सिंह जैसे बॉलीवुड की अगली पीढ़ी के चमकीले सितारे चिरकालिक युवावस्था में ठहरे हुए हैं, वहीं साउथ के हीरोज़ ने अमिताभ जैसी शख्सियत हासिल कर ली है।

‘केजीएफ-2’ की कहानी 1978-1981 के दौरान घटित होती है। इसमें हम रॉकी को कोलार गोल्ड फील्ड्स पर काबिज होते देखते हैं, जो कि दुनिया में जमीन का सबसे कीमती टुकड़ा है और जो वैश्विक स्वर्ण-बाजार को नियंत्रित करती हैं। उसकी ताकतवर लोगों से ठन जाती है, जिसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं (निःसंदेह प्रधानमंत्री का यह पात्र इंदिरा गांधी से प्रेरित है)।

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नैरेटर प्रकाश राज कहते हैं, ‘ताकतवर लोग ताकतवर जगहों से आते हैं, लेकिन ताकतवर लोग ताकतवर जगहों को बनाते भी हैं।’ केजीएफ किसी साम्राज्य की तरह है, जिसमें नौ खदानों को संचालित करने वाली फैक्टरी के सामने सफेद रंग का महल मौजूद है। कामगारों की नजर में रॉकी भगवान से कम नहीं। फिल्म के एक दृश्य में हम रॉकी को हसिए-हथौड़े की मदद से अपने दुश्मनों का खात्मा करते देखते हैं, जो कि मजदूरों के सशक्तीकरण का प्रतीक है।

लेकिन यही तो विडम्बना है। बॉलीवुड किसी जमाने में यह सब बहुत अच्छी तरह से करता था, लेकिन अब वह इसे भूल गया है। एक समय था जब हिंदी फिल्म उद्योग कमजोर तबके के लोगों के लिए सपने बुनता था और उसकी कहानियां एक साधारण आदमी को पूरे सिस्टम के खिलाफ लड़ते हुए दिखाती थीं।

Male-heroes are emerging from South instead of Bollywood

लेकिन जाहिर है, वह साधारण आदमी इतना भी साधारण नहीं हुआ करता था। इस तरह के रोल सामान्यतया अमिताभ बच्चन के द्वारा निभाए जाते थे, जिनका कद अपने समकालीन अभिनेताओं की तुलना में बहुत बुलंद हो गया था।

उनके लिए मां का महत्व सबसे ज्यादा होता था, ‘दीवार’ से ‘त्रिशूल’ तक यह दिखलाई देता है। तेलुगु ब्लॉकबस्टर ‘पुष्पा’ भी इसी कड़ी में थी, जिसमें हीरो अपना मुकाम बनाने के लिए संघर्ष करता है, जिससे उसके ‘नाजायज बाप’ (‘त्रिशूल’ में अमिताभ का मशहूर डायलॉग) ने उसे

वंचित कर दिया था। ‘केजीएफ’ के लेखक-निर्देशक प्रशांत नील और उसके नायक यश ने अपनी फिल्म पर अमिताभ का प्रभाव स्वीकारा है।

अलबत्ता ये अफसोस की बात है कि पुरुषों की इस दुनिया में स्त्रियों की भूमिका निजी सम्पत्ति जैसी मान ली गई है। ‘केजीएफ’ में श्रीनिधि शेट्टी का किरदार भी ऐसा ही है, जिसे जब हीरो-विलेन के द्वारा बंदी, बना लिया जाता है तो उसे उसी से प्यार हो जाता है।

वो कहता है कि ‘तुम मेरा एंटरटेनमेंट हो’ और उसके नौकर नायिका के लिए कॉस्च्यूम्स की ट्रॉली ले आते हैं, जिन्हें पहनकर वह अपने मास्टर को खुश कर सके। फिल्म के इस डायलॉग पर गौर करें औरत क्रोधित हो तो हाथ नहीं उठाते, शृंगार करके पूजा करते हैं।’

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यश- जिन्हें नवीन गौड़ा के नाम से भी जाना जाता है- के रूप में कन्नड़ इंडस्ट्री को एक ऐसा स्टार मिला है, जो अमिताभ शैली के सूट पहनकर फिल्म स्क्रीन पर अपना जलवा दिखा सकता है। बॉलीवुड बॉय्ज की भीड़ में यश, अलु अर्जुन और जूनियर एनटीआर जैसे अभिनेता परिपक्व पुरुषों जैसे दिखलाई देते हैं।

और वे वैसा एक मिलेनियल स्टाइल के साथ करते हैं। ‘केजीएफ’ में कार की प्लेट पर एमवायएन लिखा होता है, गन कलाश्निकोव होती है, ड्रिंक जॉनी वॉकर मैग्नम है और नायक की महत्वाकांक्षाएं क्षेत्रीय नहीं वैश्विक हैं। वो बड़े गर्व से कहता है कि ‘पूरी दुनिया मेरी टेरिटरी है।’ इसी तरह की डायलॉगबाजी के चलते सलीम-जावेद इतने लोकप्रिय हो गए थे।

उन्होंने अमिताभ बच्चन के रूप में एक लार्जर-दैन-लाइफ परसोना रचने में अहम भूमिका निभाई थी। दर्शकों में आज मैस्क्युलिनिटी के लिए भूख दिखलाई देती है, जिसे स्मॉल टाउन रोमांस और कॉस्च्यूम ड्रामा में फंसा बॉलीवुड परोस नहीं पा रहा है। नए और युवा पुरुष सितारों की चाह भी इतनी ही तीव्र है, जो बॉलीवुड के बजाय साठथ से ज्यादा उभरते दिखलाई देते हैं। बॉलीवुड तो अभी तक अपने तीन खान

सितारों के परे ही नहीं जा सका है! (ये लेखिका के अपने विचार है)

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